धर्म पूछ कर मार दिया,
कौन था वो, क्या आर्य था?
पर्यटक बस घूमने आया,
ना कोई सेनानी, ना दंगाई था।
पहलगाम की वादियों में, खून की लाली क्यों छाई?
बर्फ नहीं, अब राख उड़ती है — ये कैसी परछाई?
घाटी ने फिर चीख सुनी है, फिर से ममता रोई,
फिर से एक बेटी बेसुध बैठी, पापा को न जगाई।
बहुत हुआ अब, बोल उठो, ये कैसा न्याय मिलेगा?
जब मज़हब के नाम पे ही, मरने को भी मिलेगा?
हे सरकारों! ये मत कहो — “जाँच करेंगे फिर से,”
अब हर आँसू बदला मांगे, सिर्फ़ नहीं हमदर्दी से।
“वीर व्रती जो झुके नहीं,जो कटे मगर मुके नहीं।उन्हीं की संतति पूछ रही,अब तक हम चुप क्यों रहे?”— (दिनकर स्मरण)
ना मंदिर बचे, ना मस्जिद,
ना स्कूल, ना मेले।
सब कुछ निगला आतंक ने,
छोड़ गए ये जलते रेले।
अब हर गोली का उत्तर होगा, कलम नहीं, करारा हो,
हर बच्चा बोले — अब शांति नहीं, सच्चा इंकलाब दो।
घाटी को फिर फूल चाहिए, ना खून, ना खंजर का खेल,
अब आतंक नहीं — बस प्रेम रहे, और मिटे ये काले बेल।
बहुत हुआ अब, बोल उठो —
ये खामोशी शर्मिंदा है।
जो मासूमों पर गोली चले —
वो धर्म नहीं, वो गंदा है।
“हम न फूलों से सजेंगे,न तलवारें लहराएंगे।पर जो शांति में बाधा बने,उसे न्याय से हटाएंगे।”

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